सैन फ्रांसिस्को के एक स्कूल में मानविकी विषयों की छठी कक्षा की शिक्षिका ट्रिस्टन चांग अब घर पर निबंध नहीं देतीं। इसके बजाय वे मौखिक परीक्षाएँ लेती हैं: पात्रों, कथानक, विषय और रूपकों के बारे में पंद्रह प्रश्न पूछती हैं, और विद्यार्थी पाँच मिनट में उत्तर देते हैं।
पिछले साल से चांग और देश भर के माध्यमिक और उच्च विद्यालयों के दर्जनों अन्य शिक्षक परीक्षण के पुराने ढर्रों को छोड़ रहे हैं। वे गृहकार्य घटा रहे हैं, लेखन और चर्चाओं को कक्षा में ले जा रहे हैं, और अंक अब अधिकाधिक इस बात पर निर्भर करते हैं कि विद्यार्थी वास्तविक समय में कैसे सोचता है, न कि तैयार पाठ पर।
तंत्र सरल है। विद्यार्थी बिना फ़ोन और लैपटॉप के कक्षा में आता है। शिक्षक उस सामग्री पर प्रश्नों की एक श्रृंखला पूछता है जिसे साथ में पढ़ा गया था। उत्तर तुरंत दर्ज होते हैं, चैटबॉट से मदद लेने का कोई अवसर नहीं होता। लिखित कार्य कागज़ पर या कक्षा में निगरानी में किए जाते हैं। सोचने का समय सीमित होता है, इसलिए जाँची जाती है विश्लेषण करने और विचारों को जोड़ने की क्षमता, न कि किसी और के पाठ को दोहराना।
रॉयटर्स ने एक दर्जन शिक्षकों और विशेषज्ञों का साक्षात्कार लिया। आधे से अधिक विद्यार्थी और शिक्षक पहले से ही स्कूली कार्यों के लिए एआई का उपयोग कर रहे हैं। अभी यह साक्षात्कारों और अवलोकनों का डेटा है, किसी बड़े यादृच्छिक अध्ययन का नहीं। सीमा स्पष्ट है: यह ज्ञात नहीं है कि ऐसे बदलाव एक-दो साल बाद शैक्षणिक उपलब्धि पर कैसे असर डालेंगे और क्या इन्हें अलग-अलग संसाधन स्तर वाले स्कूलों में विस्तारित किया जा सकेगा।
मुख्य तनाव स्वयं तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि सोच की वास्तविक जाँच तक पहुँच किसे मिलती है। जिन कक्षाओं में शिक्षक मौखिक पूछताछ और व्यक्तिगत कार्य के लिए समय दे सकते हैं, वहाँ आलोचनात्मक विश्लेषण का कौशल विकसित होता है। बाकी स्कूलों में शिक्षकों पर बोझ बढ़ता है, और जो खुद को ढाल पाते हैं तथा जो नहीं ढाल पाते, उनके बीच की खाई और बढ़ती जाती है।
अब प्रश्न यह नहीं है कि एआई पर प्रतिबंध कैसे लगाया जाए, बल्कि यह है कि ज्ञान की जाँच के कौन-से रूप उसकी उपस्थिति को सह सकेंगे और साथ ही सभी विद्यार्थियों के लिए न्यायपूर्ण बने रहेंगे।


