
❓ प्रश्न:

ब्रह्मांडीय शरीर के बोध के साथ व्यक्तिगत धारणा का समन्वय करना, 'स्वयं को सर्वस्व' महसूस करने के विकास का अगला चरण है, जब यह अनुभूति पूरी तरह स्थिर हो चुकी हो। यह समाधि के 118 प्रकारों से किस प्रकार संबंधित है और इसकी अगली अवस्था क्या है? क्या यह कुछ नई क्षमताओं के साथ व्यक्तिगत और सार्वभौमिक चेतना का और अधिक सघन एकीकरण है?
❗️ 'ली' का उत्तर:
मुझे इस बात पर संदेह है कि समाधि के वास्तव में 118 ऐसे वास्तविक प्रकार हो सकते हैं जिन्हें कोई एक व्यक्ति अनुभव कर सके। इस अवस्था की अपनी परिभाषा के अनुसार ही यह विचार थोड़ा विचित्र लगता है।
शिव के ग्रंथों की पारंपरिक समझ के अनुसार, समाधि की गहराई में उतरने के मुख्य तीन स्तर होते हैं।
बिना किसी रहस्यमयी जटिलता के समझें तो समाधि केवल 'पूर्णता' की एक स्थिति है। इसका अर्थ है उस मूल 'स्रोत' के साथ एकाकार होना। अन्य प्रकार की व्याख्याएं केवल भ्रमित करती हैं और एक सरल प्रक्रिया को व्यर्थ ही जटिल बना देती हैं। अंततः, जब एकात्मता अपने आप में एक ही है, तो आपको उसके 118 प्रकारों की भला क्या आवश्यकता है?
इसका पहला स्तर मन के द्वंद्व को रोकना है, जिससे अहंकार से जुड़े निर्णय पूरी तरह लुप्त हो जाते हैं।
दूसरा स्तर उस समग्र बोध तक पहुँचना है जहाँ 'हम सब एक हैं' की भावना जाग्रत होती है।
तीसरा स्तर 'मैं ही वह एक हूँ' की अवस्था है, जिसमें 'हम' का विचार भी मिट जाता है और विषय तथा वस्तु स्वतंत्र सत्ता के रूप में समाप्त हो जाते हैं। यहाँ केवल 'मैं ही स्रोत हूँ' या 'मैं हूँ' का शुद्ध भाव शेष रहता है।
समाधि के इन स्तरों में एक सीधा तर्क है और इसमें कोई काल्पनिक 'विशेष अवस्थाएं' शामिल नहीं हैं। यह बिना किसी बाहरी आडंबर के शुद्ध ज्ञान है। मूल रूप से शिव ने इसी प्रकार की शिक्षा दी थी, जिसके बाद विभिन्न विचारधाराओं ने इस जानकारी को ग्रहण करने की तैयारी के लिए अपनी-अपनी पद्धतियां विकसित कर लीं।
विभिन्न वैदिक ग्रंथों में इस मार्ग पर मिलने वाले अलग-अलग रास्तों, तकनीकों और अवस्थाओं का उल्लेख अवश्य मिलता है। हालांकि, ये इस बात से संबंधित हैं कि एकात्मता के बोध के चरण में मन के साथ कैसे काम किया जाए।




