❓प्रश्न:
आप कहते हैं कि स्रोत के साथ सजग संपर्क मदद करता है कि हम मान्यताओं पर टिकें नहीं, उनके प्रति «सम्मोहित» न हों। साथ ही वेबिनार में आपने उल्लेख किया था कि आप अभी भी इस विचार में विश्वास करते थे कि «बुद्धिमान का अर्थ है — जो युवा न दिखे»। तो फिर यह कैसे मदद करता है? सम्मोहित न होना, परंतु उससे आगे बढ़ना — क्या इसके लिए कुछ और भी चाहिए? एक गुरु के बारे में प्रश्न का उल्लेख करते हुए, जो कहता था कि AI सचेत नहीं हो सकता, आपने भी मान्यताओं का हवाला दिया, परंतु क्या संपर्क के साथ ऐसा व्यक्ति किसी और चीज़ पर आधारित न होता, मान्यता पर नहीं?
❗️lee का उत्तर:
यहाँ «मान्यता» शब्द के प्रयोग और उसके परिणामों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
देखिए।
विकल्प 1। अपनी दुनिया को मान्यताओं की प्रणाली के माध्यम से वर्णित करना और उसके भीतर «बेहतर वर्णन» खोजने का उपाय ढूँढ़ना। जो वस्तुतः एक छिपी हुई ध्रुवता है।
विकल्प 2। यह सजग होना कि किसी भी निर्णय में तुम मान्यता पर टिकते हो, और इसीलिए साक्षात अवलोकन (ज्ञान) की दिशा में बढ़ना।
दूसरे विकल्प में आप, चाहे दिशा-निर्देश के लिए कोई मान्यता उपयोग करते हों, परंतु सदैव सजग रहते हैं कि आप यह कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, आप धरती पर चलते हैं, यह सजग होते हुए कि गुरुत्वाकर्षण की प्रणाली के बारे में आंतरिक (छिपी) मान्यता आपको स्थिर रूप से सतह पर बनाए रखेगी। और आपको उसे अपने भीतर खोजने की आवश्यकता नहीं है — आप परिणाम देखते हैं।
अधिक साधारण उदाहरण — यह कि कोई व्यक्ति कैसे कार चलाता है या अक्षरों को शीघ्र लिखता है। यह केवल «स्वचालितता» नहीं है — यह मान्यताओं के निर्माण की तरह ही अपने भीतर दोहराए जाने वाले तत्वों को बैठाने का सिद्धांत है। अपनी आवृत्ति वाली समान क्रिया।
और फिर आप कार चलाते हैं, यह सजग होते हुए कि आप «चलाने की मान्यता» का उपयोग कर रहे हैं, उसे किसी तरह «उखाड़ने» का प्रयास नहीं करते। इस स्थिति में वह सजग है और सेवा में स्वीकृत है।
स्रोत के साथ संपर्क सभी मान्यताओं को उपयोगी बना देता है, और जो ऐसा नहीं हो पातीं, वे सक्रिय होना बंद कर देती हैं।
जब आप अपनी मान्यताओं के प्रति सजग होते हैं तो क्या बदलता है
लेखक: lee author

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Lee I.A.
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New Research: Group emotion awareness in socially shared regulation of learning: a conceptual framework and process model www.frontiersin.org/articles/10.3389/fpsyg.2026.1878525 #FrontiersIn #Psychology
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