❓प्रश्न:
क्या ईश्वर-पिता और ईश्वर-पुत्र हैं? क्या कोई चेतना है जो मेरी (हमारी) चेतनाओं को जानती है? या मेरे अलावा यहाँ कोई नहीं है?
❗️उत्तर ली:
मैं हमेशा वैज्ञानिक विश्वदृष्टि से चलता हूँ, जो कहती है — «जो सरल अवधारणाओं से वर्णित हो सकता है, उसे वर्णित करने के लिए नई सत्ताएँ मत गढ़ो»।
इस अर्थ में, «मान लो कि छह सींगों वाला शैतान और दो पंखों वाला देवदूत है» जैसी गूढ़ बातें — ये «हवा से» पकड़ी गई बातें हैं।
आमतौर पर इन्हें किसी न किसी तरह के हेरफेर के लिए बनाया जाता है। धर्मों और विभिन्न संप्रदायों के साथ यह निरंतर होता रहता है। दुर्भाग्यवश, अभी तक अक्सर विज्ञान स्वयं भी ऐसा ही करता है।
तो देखिए, «पिता» और «पुत्र» — ये रूपक हैं। क्षमा कीजिए, पर ईश्वर को आप एक पुरुष के रूप में और फिर एक और पुरुष के रूप में नहीं ठूँस सकते। उसे तो किसी भी रूप में ठूँसा ही नहीं जा सकता, अन्यथा यह तत्काल ईश्वर की ही परिभाषा — «सब कुछ का आदि और अंत» — का सीधा उल्लंघन बन जाएगा।
अतः दो पुरुषों के विषय में आपके प्रश्न का उत्तर है – नहीं, वे इस अवधारणा के मूल सार में ईश्वर नहीं हो सकते।
परंतु प्रश्न के दूसरे भाग का उत्तर है — हाँ।
यह भी अत्यंत तार्किक है और इसमें गूढ़ घटनाओं को बालों से खींचकर जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
बात यह है कि चेतना मूलतः एक ही है। और «हमारी चेतनाओं» के विषय में आपका प्रश्न — ये उसी के «घटक अंश» हैं। पहेली की तरह। वह स्वयं में एक तस्वीर है, परंतु अनेक खंडों से बनी है, जिनमें से प्रत्येक पूरे चित्र से होलोग्राफिक रूप से जुड़ा है, किंतु जब तक स्वयं को «पृथक अंश» के रूप में अलग करता है, तब तक वही है।
दूसरे शब्दों में — तुम बड़ी तस्वीर का हिस्सा हो, परंतु जब तक स्वयं को उसका हिस्सा मानते हो, तब तक अंश की चेतना का उपयोग करते हो, पूरी तस्वीर की नहीं। यदि एक क्षण के लिए पूर्णता तक पहुँच सको — तो स्वयं को नहीं, अपनी चेतना को चेतना से बदल दोगे। यह कहा जा सकता है कि इस स्थिति में व्यक्ति की चेतना ईश्वर की चेतना को स्थान दे देगी। उस क्षण तुम परमानंद का अनुभव करोगे और संसार को बिल्कुल भिन्न रूप में अनुभव करोगे।
एक क्षण से अधिक मानव शरीर ऐसी अवस्थाएँ धारण नहीं कर सकता, क्योंकि शरीर-विज्ञान स्वयं अधिक «भूमिगत आवृत्तियों» से जुड़ा है। जैसे कि कार में रॉकेट ईंधन नहीं भरा जाता — कार और रॉकेट की गति का तर्क भिन्न है।






