क्या 'मैं हूँ' की चेतना को शामिल करने का अर्थ अपनी ज़िम्मेदारी किसी और पर टाल देना है?
❓ प्रश्न:
अगर मैं किसी स्थिति को सुलझाने का काम अपने 'मैं हूँ' स्वरूप पर छोड़ देता हूँ, तो क्या मैं उस स्थिति के निर्माण और उसके समाधान की अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ रहा हूँ?
❗️ लेखक lee का उत्तर:
आपका 'मैं हूँ' आपका ही संपूर्ण स्वरूप है, न कि कोई बाहरी सत्ता। आप अपनी ज़िम्मेदारी कहीं बाहर नहीं भेज रहे हैं, बल्कि अपनी क्षमताओं का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। यहाँ उपमा वैसी ही है जैसे कोई जूतों के फीते एक उंगली से बांधने की कोशिश करे, जबकि वह दोनों हाथों का उपयोग कर सकता है। शायद एक उंगली से फीते बांधने में 'महारत' उतनी प्रभावशाली न लगे, लेकिन दोनों हाथों का इस्तेमाल करना कहीं अधिक सहज और सुविधाजनक होता है।




