किसान बाज़ार के स्टालों पर रखी कांच की बोतलों में बैक्टीरिया और यीस्ट की एक घनी परत यानी धुंधली सी 'मदर' तैरती नज़र आती है, जो सिरके को न केवल खटास देती है, बल्कि इसमें सेब के छिलकों, ओक की छाल और हल्की किण्वित मिठास के साथ एक जीवंत और बुलबुलों भरा स्वाद भी भर देती है।
यह खास स्वाद सिर्फ वहीं पनपता है, जहाँ सेब या अंगूर एक विशेष मिट्टी में उगते हैं और हवा में वहां के स्थानीय सूक्ष्मजीव घुले होते हैं। ठंडी रातों और गर्म दिनों वाली घाटियों में सिरके की यह परत धीरे-धीरे आकार लेती है, जो पानी के खनिजों और पिछली फसल के अवशेषों को खुद में सोख लेती है। ऐसे सिरके को सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाने का मतलब उसे खत्म करना है, क्योंकि अपने मूल बैक्टीरिया के बिना यह अपनी खुशबू और प्रोबायोटिक गुण दोनों खो देता है।
वोरोनिश के पास एक छोटे से खेत की तीसरी पीढ़ी की सिरका विशेषज्ञ मारिया कोवालेवा ने आज भी वह स्टार्टर सहेज कर रखा है, जो उनकी दादी को 1967 में मिला था। वह तैयार उत्पाद को न तो पाश्चुरीकृत करती हैं, न छानती हैं और न ही इसमें कोई प्रिजर्वेटिव मिलाती हैं। वह कहती हैं, "अगर आप 'मदर' को मार देंगे, तो सिरका सिर्फ तेजाब बनकर रह जाएगा, जबकि हम तेजाब नहीं बल्कि एक जीवित प्रक्रिया बेच रहे हैं जो खरीदार की बोतल में भी जारी रहती है।"
यही वजह है कि औद्योगिक स्तर पर सजीव सिरके को दोबारा बना पाना नामुमकिन है। लंबी ढुलाई के लिए ज़रूरी पाश्चुरीकरण और छनाई की प्रक्रिया उन सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती है, जिनकी तलाश में लोग इसे खरीदते हैं। सुपरमार्केट के खानों में जो मिलता है, वह असली स्वाद और फायदों की महज एक परछाई भर है।
आज ऐसे सिरकों की मांग किसी फैशन के कारण नहीं, बल्कि मशीनी और स्टेरलाइज्ड उत्पादों से ऊब जाने के कारण बढ़ रही है। ग्राहक अब सिरके में वह धुंधलापन देखना चाहते हैं, उसकी असली खटास को महसूस करना चाहते हैं और यह जानना चाहते हैं कि बोतल के भीतर फर्मेंटेशन की प्रक्रिया अभी भी जीवित है। छोटे फार्म इस मांग को पूरा तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है: पाश्चुरीकरण के बिना इसकी शेल्फ लाइफ कम होती है और लॉजिस्टिक्स काफी महंगा पड़ता है।
असली सजीव सिरके की तलाश किसान बाज़ारों या खेतों के पास की छोटी दुकानों में करनी चाहिए, जहाँ फसल की कटाई के मौसम में इसे सीधे ड्रमों से निकालकर भरा जाता है। इसके लिए सबसे अच्छा समय शरद ऋतु का अंत है, जब ताज़े सेब या अंगूरों में फर्मेंटेशन शुरू ही हुआ होता है।
सजीव सिरका हमें याद दिलाता है कि कुछ चीज़ों को तभी सहेजा जा सकता है, जब उन्हें जीवित रहने दिया जाए।



