तनाव मुक्त आहार: विज्ञान अब सख्त पाबंदियों के बजाय लचीले मेनू को क्यों अपना रहा है

लेखक: Svitlana Velhush

तनाव मुक्त आहार: विज्ञान अब सख्त पाबंदियों के बजाय लचीले मेनू को क्यों अपना रहा है-1

थका देने वाली डाइटिंग और कैलोरी के बारीक हिसाब-किताब का दौर अब धीरे-धीरे बीते कल की बात होता जा रहा है। सख्त पाबंदियां न केवल मानसिक रूप से थका देने वाली होती हैं, बल्कि लंबे समय में ये चयापचय (metabolism) के लिए भी हानिकारक साबित हो सकती हैं। आज का विज्ञान शरीर की जरूरतों को समझने के लिए अधिक सूक्ष्म और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करता है। कड़े प्रतिबंधों की जगह अब बायोकेमिस्ट्री और बायोइदम (biorhythms) पर आधारित लचीली प्रणालियां ले रही हैं।

तनाव मुक्त आहार: विज्ञान अब सख्त पाबंदियों के बजाय लचीले मेनू को क्यों अपना रहा है-1

हाल के वर्षों की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक 'क्रोनोन्यूट्रिशन' (chrononutrition) का उभरना है। इस पद्धति का मूल मंत्र बहुत सरल है: आप क्या खाते हैं, यह तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप वह कब खाते हैं। हमारा शरीर प्राकृतिक सर्कैडियन रिदम (circadian rhythms) के अनुसार काम करता है और इंसुलिन के प्रति कोशिकाओं की संवेदनशीलता दिन के अलग-अलग समय में बदलती रहती है। शोधों से पता चला है कि यदि कार्बोहाइड्रेट की मुख्य मात्रा दिन के पहले हिस्से में ली जाए, तो शरीर ऊर्जा को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से अवशोषित कर पाता है। इसके साथ ही, आपके भोजन का मेनू सामान्य बना रह सकता है। इसमें किसी व्यक्ति को अपने पसंदीदा खाद्य पदार्थों को छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वह बस उनके सेवन के समय में बदलाव करता है। क्या महज भोजन के समय को बदलकर हम अपने स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं? व्यावहारिक अनुभव स्पष्ट करते हैं कि ऐसा करना पूरी तरह संभव है।

इसके साथ ही, व्यक्तिगत पोषण की अवधारणा जिसे 'न्यूट्रिजेनोमिक्स' (nutrigenomics) कहा जाता है, काफी मजबूती पकड़ रही है। अब इंटरनेट पर उपलब्ध सामान्य चार्ट के बजाय व्यक्तिगत स्वास्थ्य संकेतकों को प्राथमिकता दी जा रही है। आधुनिक ट्रैकर्स और स्मार्ट गैजेट्स अब रीयल-टाइम में यह बता सकते हैं कि किसी विशेष व्यक्ति का शरीर चीनी या लैक्टोज पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है। इसकी मदद से ब्रेड या डेयरी उत्पादों जैसे खाद्य समूहों को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि उनकी मात्रा को जरूरत के अनुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है।

भविष्य के नजरिए से समाज के लिए इसके क्या मायने हैं? यह आधुनिक दृष्टिकोण बिना किसी मनोवैज्ञानिक दबाव के टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को कम करता है और हृदय प्रणाली के कार्य को सामान्य बनाता है। आहार विज्ञान में हो रहे ये नवाचार अंततः मानवीय जरूरतों के अनुकूल हो गए हैं, जिससे सेहत की देखभाल एक दैनिक संघर्ष के बजाय एक सुखद आदत बनती जा रही है।

34 दृश्य

इस विषय पर अधिक लेख पढ़ें:

Replying to @tabkhz

شاورما حلبي🔥 شرائح من صدور الدجاج الرفيعة ملح فلفل شطة مجروشة بهارات الشاورما ربع كوب لبن رايب شرائح بصل بابريكا زيت زيتون عصير ليمون نغطي الدجاج ونتركه بالبراد ساعتين نشوي الدجاج في صينية بالفرن ساعة او على النار حتى ينضج ثومية: كوبين ماء ملعقتين كبار نشا ملح راس ثوم زيت زيتون

Reply
क्या आपने कोई गलती या अशुद्धि पाई?हम जल्द ही आपकी टिप्पणियों पर विचार करेंगे।