❓ प्रश्न:
प्रिय ली, आप एक से अनेक होने के उस खेल की चर्चा करते हैं जो जन्म और मृत्यु की अवधारणा को जन्म देता है। यदि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही लुप्त होती है, बल्कि सदैव बनी रहती है, तो व्यक्तित्व के जन्म-मृत्यु के चक्र और उसके समानांतर अवतारों को रैखिक रूप से कैसे समझाया जा सकता है, और क्या वह अपनी चेतना बनाए रखती है? और क्या इसका यह अर्थ है कि यह विविधता निश्चित है?
❗️ ली का उत्तर:
समय मनुष्य के लिए विद्यमान है, लेकिन उस 'एक' के लिए सब कुछ 'यहीं' की एक प्रक्रिया मात्र है।
यह विचार उससे कहीं अधिक गहरा है जितना प्रतीत होता है।
इसे इस दृष्टिकोण से देखें—भौतिक 'यहीं' का प्रत्येक बिंदु सदैव अस्तित्व में रहता है।
आपको लगता है कि आप अपना बचपन जी चुके हैं, परंतु आपके बचपन का हर क्षण अभी भी विद्यमान है।
इसका तात्पर्य यह है कि अतीत कभी ओझल नहीं होता—वह 'है' (विद्यमान है)।
यानी आत्मा एक सरल कारण से कुछ भी नहीं भूल सकती—वह पहली से लेकर अंतिम सांस तक, सभी अवतारों के हर पल में सीधे तौर पर 'यहीं' उपस्थित होती है। सभी जीवन शाश्वत रूप से जीवित हैं।
साथ ही, अस्तित्व अनिवार्य रूप से एक गतिशीलता के रूप में बना रहता है। कुछ भी स्थिर नहीं है, अन्यथा वह समाप्त हो गया होता।
इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक 'अस्तित्व' अपने वजूद को नहीं, बल्कि अपने संबंधों को गतिशील रूप से बदलता है।
जिसे आप यहाँ से वहाँ तक के जीवन के रूप में समझते हैं, वह वास्तव में आपकी गति के पथ द्वारा निर्मित अस्तित्व के प्रत्येक तत्व के संबंधों का परिवर्तन मात्र है।




