अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध के आधिकारिक बयानों के पीछे अंकारा, काहिरा और इस्लामाबाद के माध्यम से सक्रिय गुप्त कूटनीतिक रास्ते छिपे हैं, जहाँ सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय दोनों पक्षों के आर्थिक हित अधिक हावी हैं।
प्रशासन बदलने के बावजूद कुछ बुनियादी कारक इस स्थिति को नियंत्रित कर रहे हैं: प्रतिबंध ईरानी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रहे हैं, जबकि वाशिंगटन को तेल आपूर्ति में स्थिरता और तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम कसने की जरूरत है। तुर्की ईरानी गैस और उत्पादों के लिए एक पारगमन केंद्र (ट्रांजिट हब) के रूप में अपनी स्थिति का लाभ उठाता है, मिस्र अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भर होने के साथ-साथ क्षेत्र में ईरानी भागीदारों के साथ भी संपर्क बनाए रखता है, वहीं पाकिस्तान सऊदी अरब से मिलने वाली वित्तीय मदद और ईरान के साथ अपनी सीमा पर तनाव टालने की मजबूरी के बीच संतुलन साध रहा है।
इस समय कुछ आंतरिक समय-सीमाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई हैं: अमेरिका में बजट चक्र, तुर्की के चुनाव और कर्ज के बोझ तले दबी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर पड़ता दबाव। समय की यही सुइयां सभी पक्षों को जल्दबाजी में ऐसे गुप्त समझौते तलाशने के लिए मजबूर कर रही हैं, जिनमें प्रतिबंधों को पूरी तरह से हटाने की शर्त शामिल न हो।
इस पूरे घटनाक्रम का एक छिपा हुआ पहलू यह है कि अनिश्चितता के लंबे खिंचने से मध्यस्थ देशों को सीधा फायदा हो रहा है: तुर्की प्रतिबंधों के बीच व्यापारिक रास्तों से मुनाफा कमा रहा है, मिस्र को अतिरिक्त सुरक्षा गारंटी मिल रही है, और पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय प्रासंगिकता बनाए हुए है। कड़े रुख वाले आधिकारिक बयान दरअसल इन आपसी लाभों पर पर्दा डालने का काम करते हैं।
वर्ष 2013-2015 का ऐतिहासिक उदाहरण, जब ओमान और कजाकिस्तान ने समानांतर माध्यमों का संचालन किया था, यह साबित करता है कि वास्तविक कूटनीतिक सफलताएं सीधी बातचीत के बजाय तीसरे देशों के जरिए ही मिली थीं। आज स्थिति अलग इसलिए है क्योंकि इसमें अपने निजी आर्थिक हितों के साथ तीन बड़े देश शामिल हैं, जो इन कूटनीतिक रास्तों को अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।
मुख्य शक्तियां अब एक सीमित समझौते के बिंदु पर सहमत होती दिख रही हैं: यूरेनियम संवर्धन सीमित करने और कैदियों की अदला-बदली के बदले में प्रतिबंधों में आंशिक राहत देना। ऐसा नतीजा सभी पक्षों को अपनी साख बचाने और अगले छह महीनों में प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त करने का अवसर देगा।
दो बड़े कारक—इजरायल का संभावित कड़ा रुख और तेल की कीमतों में अचानक उछाल—इस पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार सकते हैं, हालांकि इसके लिए बाहरी उकसावे की जरूरत होगी जो फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। जब तक फारस की खाड़ी में तनाव अचानक नहीं बढ़ता, तब तक यह पूर्वानुमान सटीक बना रहेगा।
आगामी चार हफ्तों के भीतर तुर्की के विदेश मंत्री द्वारा "रचनात्मक संपर्कों" को लेकर दिया जाने वाला कोई भी सार्वजनिक बयान एक बड़ा संकेत होगा; इसका आना तयशुदा दिशा में प्रगति की पुष्टि करेगा।
ऊर्जा क्षेत्र में तुर्की और ईरान की साझा परियोजनाओं से जुड़ी किसी भी खबर पर विशेष ध्यान दें—यही वह जगह होगी जहाँ बातचीत की वास्तविक प्रगति खुलकर सामने आएगी।



