23 से 26 जू न 2026 तक लंद न में अं तररा ष्ट्री य सम्मे लन NIME 2026 (म्यू ज़िक ल एक्स प्रे शन के लि ए नए इंटरफे स) का आयो जन हो रहा है, जो सं गीत तकनीक की दुनि या के सबसे महत्व पूर्ण कार्यक्रमों में से एक है और इसमें दुनि या भर के सं गीतका र, इंजी नि यर, डि ज़ा इनर, कलाका र और शोधकर्ता एक साथ आते हैं।
वि ज्ञा न, कला और तकनीक के इस संग म पर एक ऐसे सवा ल पर चर्चा की जा रही है, जो कुछ दशक पहले तक कि सी वि ज्ञा न कथा (सा इं स फिक्शन) की तरह लगता था:
आज के दौर में वा स्तव में कि से एक वा द्य यं त्र मा ना जा सकता है?
सदि यों से इसका जवा ब बि लकुल स्पष्ट था। वा यलि न, पि या नो, बां सुरी , ड्रम। ये वे भौ ति क वस्तु एं हैं जो ध्वनि उत्प न्न करने के ज्ञा त तरी कों से स्वर पैदा करती हैं।
लेकि न NIME 2026 में प्रस्तुत परि यो जना एं दर्शा ती हैं कि ये पारंपरि क सी मा एं ते ज़ी से बदल रही हैं।
यहाँ सं गीत का जन्म शरी र की गति वि धि यों , संके तों , स्पर्श और डि जि टल वा तावरण के बी च आपसी तालमेल से होता है। शोधकर्ता ऐसी पहनने यो ग्य सं गीत प्रणाली , स्पर्श-आधा रि त इंटरफे स, त्रि -आया मी ध्वनि वा तावरण और ध्वनि के साथ संवा द के नए तरीके वि कसि त कर रहे हैं, ता कि सं गीत को न केवल का नों से, बल्क़ि पूरे शरी र से महसू स कि या जा सके ।
इस सम्मे लन के प्रमुख वि षयों में से एक सं गीत सृजन में आर्टि फि शि यल इंटेलिजेंस (AI) की भूमि का रही है।
हालाँ कि , यहाँ बा त मशीन द्वारा इनसा न की जगह लेने की नहीं हो रही है।
इसके वि परी त, AI को अब एक नए वा द्य यं त्र के रूप में देखा जा रहा है—एक ऐसा जुगलबं दी सा थी , जो रचना त्मक क्षमताओं का विस्ता र करने और इनसा न तथा तकनीक के बी च संवा द के नए रूप पैदा करने में सक्षम है।
NIME 2026 का आयो जन इं पी रि यल कॉलेज लंद न की ऑगमेंटेड इंस्ट्रूमेंट्स लेबोरेटरी और लॉ फबोरो यूनि वर्सि टी लंद न की CHAOS लैब द्वारा कि या गया है। यहीं वह मंच तैया र हो रहा है जहाँ सं गीत का अभ्या स, इंजी नि यरिं ग, इंटरै क्शन डि ज़ा इन, सं ज्ञा ना त्मक वि ज्ञा न और मानवी य बोध से जु ड़े शोध आपस में मि लते हैं।
लेकि न शा यद इस सम्मे लन की भावना को शोध पत्रों से कहीं बेहतर यहाँ के जी वंत कला त्मक प्रोजेक्ट्स बयां करते हैं।
NIME 2026 के मुख्य प्रति भा गि यों में सैन फ्रां सि स्को की प्रयो गा त्मक कलाका र और ध्वनि शोधकर्ता EVICSHEN (वि क्टोरि या शेन) शा मि ल हैं।
अपने परफॉरमें स में वह मॉड्यूलर सिंथेसाइज़र, खुद बनाए गए इले क्ट्रॉनि क उपकरणों , कॉन्टै क्ट मा इक्रो फोन और वि भि न्न भौ ति क वस्तुओं का उपयो ग करके ध्वनि को एक सजी व माध्यम में बदल देती हैं।
उनका काम सं गीत, ध्वनि -वि ज्ञा न और बोध (परसेप्श न) के अनुसंधा न की सी मा पर स्थि त है। यहाँ ध्वनि केवल वह नहीं रह जा ती जिसे हम सुनते हैं। यह वह बन जा ती है जिसे कंपन, स्था न, गति और उपस्थि ति के माध्यम से महसू स कि या जा सकता है।
यही वे प्रोजेक्ट्स हैं जो यह समझने में मदद करते हैं कि आधुनि क सं गीत वि ज्ञा न अब केवल नई ध्वनि यों के नि र्मा ण में ही नहीं , बल्क़ि अनुभव की प्रक्रि या में भी इतनी रुचि क्यों ले रहा है।
एक इनसा न सं गीत को कैसे महसू स करता है?
क्यों कुछ खास लय शां ति का अहसा स करा ती हैं, जबकि अन्य तनाव, प्रतीक्षा या प्रे रणा पैदा करती हैं?
ध्वनि हमारे ध्या न, स्मृति और भावा त्मक स्थि ति को कि स प्रकार प्रभा वि त करती है?
आज इन सवा लों का अध्यय न न केवल सं गीतका रों द्वारा , बल्क़ि तंत्रि का वि ज्ञा न (न्यू रोसा इं स), बोध के मनो वि ज्ञा न, ध्वनि -वि ज्ञा न और मानवी य अनुभव के डि ज़ा इन क्षे त्र के वि शेषज्ञों द्वारा भी कि या जा रहा है।
NIME के कुछ प्रोजेक्ट सं गीत को शरी र के कंपनों के माध्यम से महसू स करने की अनुम ति देते हैं। अन्य 'स्पेशि यल साउंड' पर शोध करते हैं, जहाँ श्रोता सं गीत के स्रोत के सामने नहीं बल्क़ि ध्वनि वा तावरण के भी तर होता है। अन्य प्रोजेक्ट इनसा न के हाव-भाव और गति वि धि यों को वास्तवि क समय में सं गीत रचना के तत्वों में बदल देते हैं।
वास्तवि कता में, सं गीत अब केवल सुनने की वस्तु मात्र नहीं रह गया है।
यह भागीदारी का एक रूप बनता जा रहा है।
श्रोता अब इस अनुभव का सह-रचयि ता बनता जा रहा है।
पहली नज़ र में यह सब भवि ष्य की तकनीक जैसा लग सकता है।
लेकि न इन प्रोजेक्ट्स को जितनी गहराई से आप देखते हैं, उतना ही स्पष्ट होता जा ता है: केंद्र में तकनीक नहीं है।
इसके केंद्र में मनुष्य है।
उसका बोध। उसकी महसू स करने की क्षमता। ध्वनि के माध्यम से दुनि या के साथ उसका संवा द।
सं गीत हमारे पा स कंपनों के रूप में आता है, जिन्हें न केवल का नों द्वारा बल्क़ि शरी र के पूरे संवे दी तंत्र द्वारा ग्रहण कि या जा ता है। वि भि न्न लय, स्वर-गुण और आवृ त्ति संरचना एं अलग-अलग भावा त्मक और शा री रि क स्थि ति यां पैदा कर सकती हैं, जो हमारे ध्या न, स्मृति , मनो दशा और आसपास की दुनि या से हमारे जु डा़ व को प्रभा वि त करती हैं।
शा यद यही कारण है कि सं गीत मानवी यता की सबसे प्राचीन और सार्वभौ मि क भाषाओं में से एक बना हुआ है।
यह हमसे शब्दों से परे एक गहरे स्तर पर बा त करता है। यह हमारी आंत रि क स्थि ति यों को दर्शाता है। यह नई संभावना ओों को खोजने में मदद करता है। यह उस 'अनकहे' को 'श्रव्य' में अनुदि त कर देता है।
इस आयो जन ने पृथ्वी की ध्वनि यों में क्या नया जो ड़ा ?
सं गीत उन कुछ दुर्लभ घटना ओों में से एक है जो एक साथ कला, वि ज्ञा न और मानवी य अनुभव की दुनि या का हि स्सा है।
यह हवा के भौ ति क कंपनों से जन्म लेता है, मस्ति ष्क के बोध की अत्यंत जटि ल प्रणा लि यों से गुजरता है और भावना , स्मृति , प्रे रणा या आंत रि क स्थि ति में बदल जा ता है।
सहस्रा ब्दि यों से मानवी यता उन भावनाओं को व्यक्त करने के लि ए नए उपकरण बना रही है जिन्हें शब्दों में बयां करना असं भव है। आज शोधकर्ता अगला कदम उठा रहे हैं—वे न केवल उपकरणों का, बल्क़ि मनुष्य, शरी र, स्था न और ध्वनि के बी च के संबंधों का अध्यय न कर रहे हैं।
और हम ध्वनि की प्रकृति की जितनी गहराई से पड़ताल करते हैं, उतना ही स्पष्ट होता जा ता है:
सं गीत केवल कंपनों को व्यवस्थि त करने का एक तरी का नहीं है।
यह मनुष्य, दुनि या और उसके भी तर महसू स की जा सकने वाली संवे दना ओों के बी च एक प्रति ध्वनि का स्था न है। यह उन तरी कों में से एक है जि नसे जी वन स्वयं को पहचानता है।



