जीन एडिटिंग में बड़ी कामयाबी: सात महीने का बच्चा बना पहला 'ठीक' होने वाला मरीज

लेखक: Tatyana Hurynovich

जीन एडिटिंग में बड़ी कामयाबी: सात महीने का बच्चा बना पहला 'ठीक' होने वाला मरीज-1

आनुवंशिक बीमारियां, जिन्हें कल तक मौत की सजा माना जाता था या जिनके लिए अंगों के प्रत्यारोपण की जरूरत होती थी, वे अब डीएनए की सटीक एडिटिंग तकनीक के सामने पीछे हटने लगी हैं। 2024 के अंत और 2025 की शुरुआत के बीच हुई इस घटना ने आधिकारिक तौर पर 'मांग पर' तैयार की जाने वाली व्यक्तिगत जीन थेरेपी के युग की शुरुआत कर दी है।

एक जानलेवा दोष

यह कहानी केजे (KJ) नाम के उस शिशु से शुरू हुई, जिसका जन्म 1 अगस्त 2024 को हुआ था। डॉक्टरों ने उसमें कार्बामॉयल फॉस्फेट सिंथेटेस-1 (CPS1) की कमी का पता लगाया था—जो यूरिया चक्र से जुड़ी एक अत्यंत दुर्लभ और घातक स्थिति है। इस बीमारी में लिवर प्रोटीन के अपशिष्ट उत्पादों को संसाधित नहीं कर पाता, जिसकी वजह से रक्त में जहरीला अमोनिया तेजी से जमा होने लगता है। बिना किसी तत्काल हस्तक्षेप के, इसकी परिणति मस्तिष्क की सूजन, कोमा और मृत्यु के रूप में होती है।

पारंपरिक चिकित्सा पद्धति केवल दो ही रास्ते सुझाती है: जहरीले तत्वों को निकालने वाली दवाओं के साथ जीवनभर का बेहद सख्त खान-पान या फिर शिशु की अवस्था में ही लिवर प्रत्यारोपण का उच्च जोखिम उठाना।

एक अकेले मरीज के लिए दवा

चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया (CHOP) और यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया (UPenn) के वैज्ञानिकों की टीम ने एक बिल्कुल नए रास्ते पर चलने का फैसला किया। मात्र छह महीनों के भीतर, उन्होंने कोशिकाओं और जानवरों पर परीक्षण करके एक व्यक्तिगत दवा का डिजाइन तैयार किया और उसे निर्मित किया।

इसका आधार सीआरआईएसपीआर (CRISPR) तकनीक का एक प्रकार है—जिसे बेस एडिटिंग (base editing) कहा जाता है। यह उपकरण एक 'आणविक इरेज़र' की तरह काम करता है: यह CPS1 जीन में दोषपूर्ण 'अक्षर' को ढूंढता है और डीएनए की कुंडली को काटे बिना ही अत्यंत सटीकता से उसे सही अक्षर से बदल देता है। लिपिड नैनोपार्टिकल्स के माध्यम से इस दवा को सीधे लड़के के लिवर की कोशिकाओं तक पहुँचाया गया।

उपचार के इस कोर्स में तीन इंजेक्शन शामिल थे, जो केजे को फरवरी, मार्च और अप्रैल 2025 के दौरान दिए गए थे, जब उसकी उम्र 6 से 8 महीने के बीच थी। यह मामला इतिहास में *इन विवो* (जीवित शरीर के भीतर) सीआरआईएसपीआर-थेरेपी का पहला उदाहरण बन गया है, जिसे विशेष रूप से एक ही व्यक्ति के अद्वितीय उत्परिवर्तन के लिए तैयार किया गया था।

परिणाम और वास्तविक स्थिति

साल 2026 तक की स्थिति के अनुसार, इस प्रायोगिक उपचार के परिणामों को एक असाधारण सफलता माना जा रहा है, लेकिन इसमें कुछ महत्वपूर्ण चिकित्सकीय शर्तें भी शामिल हैं:

  • नैदानिक स्थिति: केजे के भीतर से खतरनाक लक्षण पूरी तरह गायब हो चुके हैं, अमोनिया का स्तर सामान्य सीमा में स्थिर हो गया है, और लिवर में संशोधित CPS1 एंजाइम अपनी आदर्श क्षमता के लगभग 65% पर काम करने लगा है। यह बालक सामान्य रूप से विकसित हो रहा है और अब चलना व बोलना सीख रहा है।
  • क्या उसे पूरी तरह स्वस्थ माना जा सकता है? वैज्ञानिक फिलहाल 'पूरी तरह ठीक' शब्द का इस्तेमाल करने से बच रहे हैं। हालांकि इस थेरेपी ने बच्चे के जीवन की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार किया है और उसके भोजन के विकल्पों को बढ़ा दिया है, लेकिन वह अभी भी डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में है और कुछ आहार संबंधी प्रतिबंधों का पालन कर रहा है।

आगे क्या?

वर्तमान में, ऐसी व्यक्तिगत दवा तैयार करने की लागत एक अत्यंत जटिल लिवर प्रत्यारोपण की कीमत के बराबर है। हालांकि, इसके विकासकर्ताओं को पूरा भरोसा है कि जैसे-जैसे इस प्लेटफॉर्म का विस्तार होगा, यह तकनीक काफी सस्ती होती जाएगी। केजे की सफलता ने इस पद्धति की व्यावहारिकता को सिद्ध कर दिया है, और आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक पूर्ण नैदानिक अध्ययन शुरू करने की योजना बना रहे हैं, ताकि गंभीर मेटाबॉलिक विकारों वाले अन्य बच्चों को बचाने के लिए इन सीआरआईएसपीआर-कैंची को अनुकूलित किया जा सके।

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