ब्रिटेन के सफ़ोक स्थित जिमी वाइल्डलाइफ पार्क में गोल्फ की गेंद के आकार के अंडे से एक नन्हा पैनकेक कछुआ निकला है। 'वफ़ल' और 'मेपल' नाम के कछुआ जोड़े से जन्मे इस बच्चे का वजन महज कुछ ग्राम है। हालांकि, इस छोटी सी घटना के पीछे विलुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए चल रहा एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास छिपा है।
पैनकेक कछुआ (Malacochersus tornieri) विकासवाद का एक अद्भुत उदाहरण है। अपने अन्य सजातीय जीवों के विपरीत, इसका कवच चपटा, मुलायम और लचीला होता है। प्रकृति ने इसे ऐसा रूप क्यों दिया? यह केन्या और तंजानिया के शुष्क सवाना क्षेत्रों में रहने के लिए एक आदर्श अनुकूलन है। खतरा महसूस होने पर, यह कछुआ चट्टानों की संकीर्ण दरारों में छिप जाता है और अपने शरीर को फुलाकर खुद को वहां मजबूती से फंसा लेता है।
लेकिन शिकारियों से बचाने वाली यह खूबी इंसानी खतरों के सामने बेअसर है। पिछले तीस वर्षों में, जंगलों में इस प्रजाति की आबादी में 80% की भारी गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण कृषि के लिए पथरीले आवासों का विनाश और विदेशी पालतू जानवरों के अवैध व्यापार के लिए बड़े पैमाने पर तस्करी है। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) ने पहले ही इस प्रजाति को 'अत्यधिक संकटग्रस्त' श्रेणी में डाल दिया है।
क्या यूरोप के चिड़ियाघरों के स्थानीय प्रयास पूर्वी अफ्रीका के पारिस्थितिकी तंत्र को बचा सकते हैं? जाहिर है, कृत्रिम बाड़े कभी भी प्राकृतिक आवास की जगह नहीं ले सकते। लेकिन नियंत्रित प्रजनन एक अत्यंत महत्वपूर्ण आनुवंशिक भंडार तैयार करता है। यदि यह प्रजाति जंगलों से पूरी तरह विलुप्त हो जाती है, तो ये कृत्रिम आबादियां ही उन्हें फिर से प्राकृतिक परिवेश में वापस लाने का एकमात्र जरिया होंगी।
सफ़ोक में इस कछुए का ऊष्मायन अफ्रीकी सवाना के बदलते मौसम के अनुरूप पूरी तरह नियंत्रित परिस्थितियों में किया गया। फिलहाल, पार्क के कर्मचारी इस नवजात के नाम के चयन के लिए सार्वजनिक मतदान करा रहे हैं। यह जागरूकता फैलाने का एक सरल लेकिन प्रभावी तरीका है: एक कछुए की कहानी से लोगों को जोड़कर, पर्यावरणविद् दुनिया भर में दुर्लभ जानवरों की तस्करी के गंभीर मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
ब्रिटिश प्राणीशास्त्रियों की यह सफलता सिद्ध करती है कि लक्षित संरक्षण कार्यक्रम वास्तव में कारगर होते हैं। भविष्य में, ऐसी पहल वैज्ञानिकों को अफ्रीका के नष्ट हो चुके प्राकृतिक परिवेश को पुनर्जीवित करने के लिए जरूरी समय प्रदान करती हैं। ग्रह की जैव विविधता को बचाने का यह प्रयास अभी जारी है — जो कभी-कभी अपने मूल निवास से हजारों किलोमीटर दूर कृत्रिम इन्क्यूबेटरों में आकार लेता है।



