1879 में एडविन हॉल ने देखा कि चालक में धारा के लंबवत चुंबकीय क्षेत्र अनुप्रस्थ वोल्टता उत्पन्न करता है। एक शताब्दी से अधिक समय तक यह माना जाता रहा कि यह प्रभाव केवल इसी स्थिति में काम करता है — क्षेत्र नमूने के तल के बिल्कुल लंबवत। कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसके विपरीत सिद्ध किया।
शोधकर्ताओं ने टैंटलम-इरिडियम-टेलुराइड और चुंबकीय क्रोमियम-जर्मेनियम-टेलुराइड की कई परमाणु परतों से एक अति सूक्ष्म विषमसंरचना बनाई। क्रिस्टलों की सममिति के सटीक चुनाव और परतों के निकट संपर्क के कारण दूसरी सामग्री का चुंबकत्व पहली में उसके इलेक्ट्रॉनिक गुणों को नष्ट किए बिना समा गया।
ऐसे उपकरणों में वैज्ञानिकों ने न केवल परिचित हॉल संकेत दर्ज किया, बल्कि एक दूसरी, असामान्य अनुक्रिया भी, जो पदार्थ के तल में चुंबकीयकरण पर निर्भर करती है। इसका अर्थ है कि एक छोटा संवेदक अब चुंबकीय क्षेत्र को एक साथ दो अक्षों पर माप सकता है।
पहले सदिश चुंबकत्वमापन के लिए दो अलग-अलग संवेदक लगाने पड़ते थे। नई संरचना निर्माण को सरल बनाती है और इलेक्ट्रॉनिकी, परिवहन तथा चिकित्सा निदान में अधिक सुसंहत उपकरणों का मार्ग खोलती है।
सैद्धांतिक प्रतिरूपण से पता चला कि परतों की सीमा पर एक अतिरिक्त स्पिन-कक्षीय अंतःक्रिया उत्पन्न होती है, जो पहले "निषिद्ध" रही अनुक्रिया को संभव बनाती है। प्रयोग ने भविष्यवाणियों की पुष्टि की, हालाँकि सटीक क्रियाविधि अभी स्पष्ट की जा रही है।
दल पहले से ही अन्य सामग्री संयोजन खोज रहा है और कमरे के तापमान पर उपकरणों का कार्य जाँच रहा है। यदि परिणाम स्थिर निकला, तो एकल-क्रिस्टल बहुआयामी हॉल संवेदक आने वाले ही वर्षों में रोज़मर्रा की तकनीक में आ सकते हैं।
एक नन्हा उपकरण अब कई पुराने संवेदकों का स्थान ले सकता है।


