❓ प्रश्न:
इच्छा के बाहरी स्वरूप से मोह न रखने का क्या अर्थ है? क्या इसका तात्पर्य यह है कि विशिष्ट वस्तुओं या लोगों की कल्पना करने का कोई मतलब नहीं है?
❗️ ली (lee) का उत्तर:
मुझे लगता है कि मैं इस विषय पर यहाँ पहले भी हज़ारों बार अपनी बात रख चुका हूँ।
इसे इस तरह से समझते हैं।
यदि आपकी दिलचस्पी किसी फिल्म में है, तो आपको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसे किस सिनेमा हॉल में या किस टीवी स्क्रीन पर देख रहे हैं।
लिहाज़ा, जब आपका पूरा ध्यान फिल्म देखने की इच्छा पर होता है, तो आप बड़ी आसानी से कोई भी सुविधाजनक सिनेमाघर या टीवी का एक बेहतर विकल्प तलाश लेते हैं।
लेकिन, अगर आप इस ज़िद पर अड़ जाएँ कि वह खास फिल्म केवल आपके पसंदीदा सिनेमाघर में ही दिखाई जानी चाहिए... तो मुमकिन है कि आप उस फिल्म को कभी देख ही न पाएँ।
अहसासों का चुनाव करना दरअसल एक संक्षिप्त रास्ता चुनने के समान है।
किसी विशेष स्वरूप का चयन करना अपने जीवन को अनावश्यक रूप से जटिल बनाने जैसा है। इसके अलावा, मुमकिन है कि बाहरी तौर पर तो आपको वांछित वस्तु मिल जाए, पर भावनात्मक रूप से वह आपको संतुष्ट न कर पाए। तो क्या तब भी आपको उसकी चाहत रहेगी? मेरा एक चिर-परिचित उदाहरण है – क्या आपको किसी निर्जन द्वीप पर एक अरब डॉलर और सोने का अंबार चाहिए?




